
कवर्धा। प्रधानमंत्री मोदी के नेतृत्व में नारी शक्ति वंदन अधिनियम के तहत महिलाओं को लोकसभा और विधानसभा में 33% आरक्षण देने वाले ऐतिहासिक संवैधानिक संशोधन विधेयक शुक्रवार को लोकसभा में पारित नहीं हो पाया। इस अधिनियम को पारित होने से रोकने के लिए कांग्रेस, टीएमसी, डीएमके और समाजवादी पार्टी द्वारा एकजुट होकर महिलाओं के लिए लाये गए इस अधिकार का विरोध करते हुए लोकसभा सदन में उसे पारित होने से रोक दिया गया।
विपक्षी पार्टियों द्वारा किये गए इस कृत्य पर प्रतिक्रिया देते हुए पंडरिया विधायक भावना बोहरा ने कहा कि महिलाओं को नेतृत्व और निति निर्माण की दिशा में विशेष स्थान देने के लिए प्रधानमन्त्री मोदी और गृह मंत्री शाह के नेतृत्व में नारी शक्ति वंदन अधिनियम पारित करने हेतु 16 से 18 अप्रैल तक लोकसभा में विशेष सत्र बुलाया गया है लेकिन, विपक्षी पार्टियों द्वारा लोकसभा में जो किया गया, वह भारत की प्रत्येक महिला के सम्मान और अधिकारों के साथ सीधा अन्याय है। नारी शक्ति वंदन अधिनियम के माध्यम से महिलाओं को 33% आरक्षण देने का ऐतिहासिक अवसर विपक्ष ने एक बार फिर अपने राजनीतिक स्वार्थ के लिए कुर्बान कर दिया। कांग्रेस, टीएमसी, डीएमके और समाजवादी पार्टी ने मिलकर महिलाओं के सशक्तिकरण की इस पहल को रोकने का जो निंदनीय काम किया वह बेहद दुर्भाग्यपूर्ण है। चुनाव के दौरान लड़की हूँ लड़ सकती हूँ का नारा देने वाली कांग्रेस पार्टी और उनके साथ अन्य विपक्षी पार्टियों ने इस अधिनियम में बाधा लाने का जो कार्य किया है उससे स्पष्ट है कि उनके लिए महिलाएं केवल एक वोट बैंक हैं, लेकिन मैं कहना चाहती हूँ कि महिलाएं केवल वोट बैंक नहीं हैं, वे इस देश की शक्ति हैं, भविष्य हैं। उनके अधिकारों को बार-बार कुचलने की यह मानसिकता देश कभी स्वीकार नहीं करेगा।
उन्होंने आगे कहा कि प्रधानमंत्री मोदी ने महिलाओं के सुरक्षा, सम्मान, सहभागिता और उनके स्वाभिमान को अपनी नीतियों के केंद्र में रखकर उन्हें प्रतिनिधित्व का अवसर देने का सार्थक प्रयास किया,लेकिन विपक्षी पार्टियों ने महिलाओं के सम्मान और अधिकारों को दरकिनार करने का जो कृत्य किया है वह दुर्भाग्यपूर्ण है। एक महिला जनप्रतिनिधि होने के नाते मैं स्पष्ट कहना चाहती हूं नारी शक्ति का यह अपमान अब हर गांव, हर शहर और हर मंच पर गूंजेगा। देश की माताएं-बहनें इसका जवाब लोकतांत्रिक तरीके से अवश्य देंगी। नारी शक्ति वंदन अधिनियम के तहत महिलाओं को लोकसभा और विधानसभा में 33% आरक्षण देने वाले ऐतिहासिक संवैधानिक संशोधन विधेयक को कांग्रेस, टीएमसी, डीएमके और समाजवादी पार्टी द्वारा बाधित करना लोकतंत्र की भावना और महिलाओं के संवैधानिक अधिकारों के साथ सीधा खिलवाड़ है। यह विधेयक केवल एक कानून नहीं, बल्कि देश की करोड़ों महिलाओं के वर्षों पुराने संघर्ष, उनके सपनों और उनके समान भागीदारी के अधिकार का प्रतीक है। इस पहल के माध्यम से महिलाओं को नीति निर्माण, नेतृत्व और निर्णय लेने की प्रक्रिया में सशक्त भागीदारी सुनिश्चित करने का मार्ग प्रशस्त होना था। लेकिन विपक्ष ने अपने संकीर्ण राजनीतिक स्वार्थों के चलते इस ऐतिहासिक अवसर को कुचलने का कार्य किया है। यह केवल विरोध नहीं, बल्कि महिलाओं के आत्मसम्मान, उनके नेतृत्व और उनकी क्षमता पर अविश्वास को दर्शाता है।





